Bihar Election 2025 - अबकी बार फिर नीतीशे कुमार !
ये तो तय है कि बिहार में फिर से होने जा रही है एन.डी.ए. की ही सरकार . . . लेकिन नीतीश कुमार क्यों हैं बीजेपी के लिए इतने अनिवार्य, अपरिहार्य???
आगे बढ़ने से पहले इन्हें सुन लीजिए…
ये हैं मोकीम अंसारी - ये उस वर्ग से हैं जिसे आमतौर पर BJP का
विरोधी माना जाता है,
निर्वाचन क्षेत्र – अलीनगर, ग्राम – बिशहथ- बघांत, जिला
– दरभंगा – मिथिला क्षेत्र. . .
मैं: वोट किसे देते हैं?
मोकीम – “कमल छाप पर।”
मैं: कमल छाप पर किसे?
मोकीम – “नीतीश कुमार…
लगभग 20 साल से बिहार में एन.डी.ए. की ही सरकार रही है, और लगभग 10 साल से “डबल इंजन की सरकार” चल रही है।
फिर भी — न तो कोई ठोस उद्योग
स्थापित हो सका, न ही उन फैक्टरियों का पुनर्जीवन हो पाया जो लालू
प्रसाद के जंगलराज के दौर में बंद हो गई थीं।
मॉर्टन की मीठी खुशबू अब भी हवा में
बीते दिनों की याद ताज़ा कर जाती है. . . इन बीस सालों में कोई नया उल्लेखनीय निवेश नहीं, और
जहां तक न्याय और कानून-व्यवस्था की बात की जाए तो उदाहरण के तौर पर बिहार के सुशांत सिंह राजपूत की हत्या को भी केंद्रीय जांच
एजेंसियों के द्वारा ढंडे बस्ते में डाल दिया गया है . . और बिहार सरकार मौन है. . . और तो और इस बार के चुनाव में तो
ये कोई मुद्दा ही नहीं है. . .लेकिन फिर भी. . .इस बार का रिकॉर्ड तोड़ मतदान, एग्ज़िट
पोल और ज़मीनी रिपोर्ट्स एक स्वर में कह रही हैं — “अबकी बार फिर नीतीशे कुमार, अबकी बार
फिर बीजेपी-एन.डी.ए. की सरकार…”
बिहार शायद देश का अकेला ऐसा राज्य है जहाँ जनता, बेरोज़गारी,
भ्रष्टाचार, गंदगी,
न्याय और विकास की कमी जैसी तमाम निराशाओं के बावजूद, सत्तारूढ़
सरकार को भारी बहुमत से जीताती हुई दिखती है।
इसका सबसे बड़ा कारण है डर!
पहला डर - जंगलराज की वापसी का डर!
हाँ, यही वह डर है जो 20 साल बाद भी बिहार की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभा रहा है। मुझे याद है, हम कभी बिहार जाते थे बस से तो दिन के समय भी हमें रास्तों में लाशें दिखती थीं. . .शाम के समय आप कभी सफ़र नहीं कर सकते थे. . .कब लुट जाएं कोई भरोसा नहीं था. . . अखबारें अपहरण की ख़बरों से भरीं रहतीं थीं. .
दूसरा डर — अंधेरे दिनों का डर!
बिजली के मोर्चे पर बिहार ने सचमुच
उल्लेखनीय प्रगति की है।
मैं खुद पिछले कुछ वर्षों से अपने
गाँव – बिशहथ(दरभंगा) जाती रही हूँ और यह मेरे लिए सुखद आश्चर्य का विषय रहा है कि
बिहार में अब लगभग 24 घंटे बिजली रहती है।
यकीन करना मुश्किल है, मगर
यह सच है…
और यह भी उतना ही सच है कि बिहार अब
फिर से लालटेन के अंधेरे में लौटना नहीं चाहता।
और सड़कों की बात करें तो —
गाँवों तक में अब सड़कें बनी हैं।
बिहार अब फिर से गड्ढों के दौर में
लौटना नहीं चाहता।
यानी तीसरा डर है — गड्ढों का डर!
दरअसल, बिहार
में बीजेपी और एन.डी.ए. की लगातार जीत के पीछे हमेशा “फियर फैक्टर” ही काम
करता रहा है।
लेकिन बीजेपी
को भी एहसास है बढ़ती एंटी-इनकम्बेंसी का, लोगों
में बढ़ती निराशा का,
और इस बात की भी समझ है कि “डर की
राजनीति” के सहारे हर चुनाव नहीं जीता जा सकता।
शायद यही वजह है कि इस बार
मोदी जी को भी कहना पड़ा —
“यह चुनाव सुशासन से समृद्धि
की ओर है।”
अगर आने वाले पाँच वर्षों
में यह नारा ज़मीन पर उतरता नहीं है,
तो संभव है कि अगली बार यह “डर की
राजनीति” उतनी प्रभावी न रह पाए।
लेकिन…
इस बार तो तय है — एन.डी.ए. की
सरकार!
और फिर से सत्ता में — Power-Play of नीतीशे कुमार!


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