वो पल जो आसपास थे आकर लिपट गये

कई ख़्वाहिशों के फूल हवा में बिखर गये

गुनगुनाती हुई इक शाम कहीं से आकर ठहर गई

कुछ अनछुए एहसास के मोती बिखर गए

हौले से गुज़री ओस में भीगी सियाह रात

पलकों में बंद ख़्वाब के जुगनू बिखर गये

सिमटे हुए जज़्बात बे-हिजाब होने लगे

कुछ अनकहे अलफ़ाज़ के पन्ने बिखर गए

वो जो पास थे मेरे एक गुलाब की तरह

यादों के बग़ीचे में महक बन कर बिखर गये


कुछ पूरे कुछ अधुरे ख़्वाहिशों के गुलदस्ते से बिखर रही है खुशबु गुज़रते साल की

नई उमंगों नई खुशियों कि चुनर ओढ़कर, आ रही है दुल्हन फिर नये साल की

नये साल की हार्दिक शुभकामनाएं।।




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